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Thursday, 31 March 2016

दूसरी पारी

रिटायर हो चुके लोगों की तरफ से ना-रिटायर हुए लोगों के लिए एक शेर पेश है:
तुम काम करते हो
मैं आराम करता हूँ,
तुम अपना काम करते हो,
मैं अपना काम करता हूँ!

मतलब ये के बहुत काम कर लिया, बहुत ट्रांस्फरें झेल ली, कामचोर और चमचे देख लिए, अड़ियल और मरियल बॉस देख लिए, नखरेलु और पकाऊ जूनियर देख लिए. यूनियन के नेता और अभिनेता भी देख लिए. फाइलें देखीं जो चलती ही नहीं थी और ऐसी भी देखीं जो रूकती नहीं थी. तो अब क्या आराम भी ना फरमाएं?

दूसरी पारी की शुरुआत अपने देश में कहीं 60, कहीं 62 और कहीं 65 साल के बाद शुरू होती है. अन्य देशों में भी एक जैसी न होकर अलग अलग है जैसे कि:

देश           पुरुष           महिलाएं 

चीन          60               50-55
डेनमार्क    65-67          65-67
इजराइल   67               62      
यू के         65               60
यू एस ए    62-67          62-67
नोर्वे          67               67

इन्टरनेट में ये भी पाया कि यूरोप में 2040 तक रिटायरमेंट 70 साल तक पहुँच जाएगी. सब ठीक ठाक चलता रहा तो भारत में भी रिटायरमेंट ऐज धीरे-धीरे बढ़ सकती है.

पर रिटायर होने के बाद समय काफी होता है जिसका उपयोग घूमने, पढ़ने, गाने-बजाने, क्लब या किसी सामाजिक  कार्य में लगाया जा सकता है. इस तरह की कई चीज़ें जिनके लिए पहले इच्छा तो थी पर समय नहीं था अब की जा सकती हैं.

विकसित देशों में रिटायरमेंट के बाद घुमने की प्रथा बहुत है. तो आप भी उठाइए चाबी गाड़ी की. या फिर रेल या जहाज का टिकट कटाइये और घूमना शुरू कर दीजिये. अकेले या ग्रुप में. भारत विशाल देश है, समंदर, रेगिस्तान और बर्फीले पहाड़ सभी कुछ हैं यहाँ. मंदिर, महल और किले हैं, जंगल, नदियाँ और तीर्थ हैं कहीं न कहीं तो दिल लग ही जाएगा. रहने के लिए होटल, गेस्ट हाउस, होम-स्टे या धर्मशाला सभी स्थानों में मिल जाती हैं. कहीं कहीं वरिष्ट नागरिक को छूट भी मिल जाती हैं. इसी तरह फल, डबल रोटी, और हर तरह का हल्का खाना भी मिल जाता है. इसलिए घूमिये खूब घूमिये.

यूरोप की तरह यहाँ ओल्ड ऐज होम या मुफ्त मेडिकल वगैरा की सुविधा नहीं हैं. वहां सीनियर्स को सुविधाएं ज्यादा हैं पर हमारे यहाँ कम हैं क्यूंकि इस ओर ध्यान कम दिया गया है. सीनियर्स का और टूरिज्म का बढ़िया मेल हो सकता है जो सबके लिए फायदेमंद हो सकता है अगर सरकार ध्यान दे तो. पर फिकर-नॉट सरकार तंगदिल हो तो हो फिर भी हम तो यही कहेंगे:

तेरी तंगदिली जानता हूँ साकी,
ओक से पीता हूँ इसलिए,
कहीं तुझे अंदाज़ न हो !

टिम्बर ट्रेल, परवानू, हिमाचल 



Monday, 28 March 2016

सीनियर सिटीज़न की ख्वाहिश

रिटायरमेंट पार्टी ख़त्म हुई. अब अपने हिसाब किताब निकालो - पेंशन कितनी मिलेगी या फण्ड कितना मिलेगा या जीवन बीमा के पैसे कितने मिलेंगे वगैरा. महीने का खर्च कितना होगा बाकी बैंक में जमा करा देंगे ब्याज मिलता रहेगा. ये तो खैर तनख्वाह लेने वालों का किस्सा है. औरों को भी इसी तरह से गद्दी छोड़ने के बाद का जुगाड़ रखना पड़ता है.

भारत में इस विषय पर आंकड़े इक्कठे करना मुश्किल काम है. देश में करीबन 10 करोड़ से ज्यादा लोग सीनियर याने 60+ की उम्र के हैं. इनमें से कितनी महिलायें हैं और कितनों को पेंशन मिलती है इस का कोई सरकारी अनुमान कहीं नज़र नहीं आया. अंदाज़न 5 - 7 % लोग ही पेंशन लेते हैं। बाकी छोटे व्यापारी और डाक्टर, वक़ील, छोटे ठेकेदार जैसे पेशेवर लोग हैं जिनकी पेंशन नहीं है. ये भी अपनी आमदनी का कुछ हिस्सा बचा कर फ़िक्स डिपोसिट या फिर ppf / nsc / kvp वगैरा में रखते हैं ताकि बुढ़ापे में दाल रोटी चलती रहे और महीने में एकाध बार बटर चिकेन और बियर की दावत हो जाए.

लेकिन भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और बैंक हर बजट मैं कैंची चलाने के चक्कर में रहते है हालाँकि महंगाई ना घाट रही भाया. सीनियर्स के लिए ओल्ड ऐज होम बनाते नहीं और हस्पताल की सुविधा देते नहीं. हवाई जहाज और रेल के टिकट में छूट देते हैं तो भैय्या सीनियर लोग कितना घूम लेंगे और कितना बचा लेंगे. आधा % ब्याज ज्यादा देते है बैंक वाले उस पर भी तिरछी नज़र रखते हैं. ये मंत्रालय और बैंक के आला अफसर तो शायद रिटायर होंगे नहीं. इन धुरंदरों का गुणगान किया है इन लाइनों में:

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
कोई सीनियर ना चाहे के उसकी रकम पर ब्याज कम निकले,
खर्चे बहुत हैं जानेमन जीने के, खाने के और पीने के,
ब्याज घटा के क्या होगा जब प्रॉफिट तेरा फिर भी कम निकले.

हे बैंकर देख तू npa को जिसकी वसूली से तेरी इनकम निकले,
पर तूने चुपके से काटा ब्याज जैसे हम तेरे दुश्मन निकले,
ब्याज जमा होने का sms पाकर लेते हैं मज़े जमा पूँजी का,
पर तेरी तंगिदली के चलते आज हम दूसरा जुगाड़ ढूँढ़ने निकले !


एक पेंशनर 

                                                                                                                                                                   

Tuesday, 22 March 2016

तीन ताले

हमारे दोस्त नरुला साब आजकल बड़े हलके फुल्के और खुश नज़र आते हैं. पिछले साल से बेटे के पास जाने का प्रोग्राम बन रहा है और अब तो टिकट भी आने वाला है. नरूला साब तैयारी में हैं की इस बार गया तो फिर वहीँ रहूँगा. फिलहाल जिस फ्लैट में वो रहते हैं उसको अच्छी तरह बंद करने के लिए तीन नए ताले भी ले आये हैं. तीनों बेडरूम पर भी ताले लगा देंगे. चाबियों का एक सेट साथ ले जाएंगे और एक सेट मित्तल साहब के पास रहेगा. नरूला साहब के वापिस ना आने की स्थिति में मित्तल साहब फ्लैट का ताला खोलेंगे और उस वक़्त शर्मा साहब और जोग साहब मौजूद रहेंगे. सामान की एक लिस्ट फ्रिज पर लगा दी गई है और फोटो कापियां तीनों दोस्तों को दे दी गई हैं.

नरूला जी की उमर 74 के पार हो चुकी है. किसी अच्छे जमाने में वो एक विदेशी एयरलाइन्स में 'होस्ट' थे. उन दिनों हवाई जहाज कम थे और 'एयर होस्टेस' तो और भी कम हुआ करती थीं. अपनी जवानी में नरूला साब ने दुनिया गोल साबित कर दी थी. दुनिया के किसी भी बड़े शहर का नाम लें तो नरूला साब फ़ौरन वहां का कोई किस्सा सुनाने के लिए तैयार हो जाते हैं. हिन्दुस्तानी तीन सितारा से लेकर सात सितारा होटल तो उनके लिए कोई मायने नहीं रखते. वो तो हमीं हैं जो मूर्थल के ढाबे के परांठे याद करते रहते हैं.

नरूला साब की स्वीटी काफी बरस पहले गुज़र गई थी शायद फिरंगी थी या शायद नहीं. कोई इस बारे में ठीक से नहीं जानता है ना ही नरूला साब उसका कभी जिक्र करते हैं. केवल अपने बेटे के बारे में कुछ प्यार से, कुछ गर्व से और कुछ घमंड से बात करते हैं. अक्सर उनके फोटो और विडियो दिखाते रहते हैं. बेटा स्विस स्कूल कॉलेजों में पढ़ा हुआ है और वहीं के एक शहर बर्न में बिजनेस करता है. अपना मकान भी है. फिरंगी बीवी है और नरूला साब का एक पोता भी है. चार साल पहले नरूला साब एक महीना वहां रह कर आए थे. बड़े चाव से वहां की बातें बताते थे. खूब घूमे, बढ़िया शराब पी और कई तरह की डिशेस का मज़ा लिया जिनका हमें नाम भी समझ नहीं आता. अपना तो देसी लंगर ही ठीक है!

यूँ तो नरूला साब साफ़ कपड़ों में चाक चौबंद रहते हैं पर साल भर से आँखों की कमजोरी और घुटने के दर्द से परेशान से रहते हैं. उन्हें उम्मीद थी की ये दोनों परेशानियां भी वहां ऑपरेशन कराके ठीक हो जाएंगी.

पर इस बार की हमारी सन्डे शाम की मीटिंग में नरूला साब बुझे बुझे से लगे. पेग लगा के भी रंगत नहीं आई. जब उनसे पूछा तो कहने लगे:
- यार मैं नहीं जा रहा बेटे के पास. रात उससे बात हुई थी. कहने लगा की आप यहाँ आ जाओ दोनों ऑपरेशन मैं करा देता हूँ. कोई दिक्कत नहीं है. अगर रहना चाहते हो तो उसके लिए मैंने ओल्ड ऐज होम भी देख लिया है. बस सिर्फ २० किमी ही है. मैंने कहा अरे यार पांच पांच बेडरूम का तेरा मकान है फिर तू क्यूँ दूसरी जगह देख रहा है. कहने लगा कि पापा आपको तो पता ही है कि यहाँ ऐसे रहने का रिवाज़ नहीं है. बहु भी नहीं मानेगी. फिर सन्डे के सन्डे मैं ओल्ड ऐज होम में मिलने आ जाऊँगा ना क्या दिक्कत है. पर मैंने मना कर दिया. पता नहीं ठीक किया या नहीं, इतना कहने के बाद नरूला साब चुप हो गए. सभी दोस्त चुप हो गए. वातावरण बोझल हो गया. कुछ देर की चुप्पी के बाद बोले:
- ज़रा बर्फ देना.

देसी माहौल 


Sunday, 20 March 2016

होली वग़ैरा

बताया नहीं अपना हाल चाल वग़ैरा,
ख़फ़ा हो क्यूँ , ऑफ हो क्यूँ वग़ैरा,
हम तो समझते थे कि समझते हैं तुमको,
हो गए जाने कैसे हम नासमझ वग़ैरा !

ज़रा मानो तो करा दें शॉपिंग वग़ैरा
डिज़ाइनर साड़ी या फिर मूवी वग़ैरा,
टेंशन छोड़ो क्रेडिट कार्ड जेब में है,
मुस्कुराओ तो ठीक हो हाज़मा वग़ैरा !

नागवारा है ये रूख इस मौसम को,
बहार आई है खिल गए हैं मुग़ल गार्डन वग़ैरा,
मूड बदल जाए तो हो जीना आसान ज़रा,
कर लेंगे फिर होली मिलन वग़ैरा !

होली है!
                                                                                                           

Tuesday, 15 March 2016

बाप बेटा

सन्डे का दिन जल्दी उठने का दिन नहीं है जनाब. सभी जवान छोरे-छोरियां देर से उठते हैं. नौकरी वाले देर से उठते हैं और नौजवान माँ बाप देर से उठते हैं इसलिए छोटे बच्चे भी देर से उठते हैं. अखबार भी देर से आता है इसलिए रविवार को सुबह पार्क शांत और खाली पड़ा रहता है. मैं पार्क में पहुँचा तो केवल एक बुज़ुर्ग लगभग 50 मीटर आगे छड़ी लेकर धीरे धीरे चलते नज़र आ रहे थे. उनको पहचाना नहीं इसलिए अपनी ही धुन में आगे निकल गया.

यकायक पीछे से घबराहट भरी आवाज़ आई 'भाई साब'! मुड़ कर पीछे देखा तो बुज़ुर्गवार चारों खाने चित्त गिरे पड़े थे. भाग कर उनका हाल पूछा. चश्मा उठाकर पहनाया और छड़ी हाथ में थमा दी. पर उन्हें उठने में और मुझे उठाने में दिक्कत हुई क्यूंकि शरीर भारी था, वो हांफ रहे थे और खड़े होने में तकलीफ महसूस कर रहे थे. धीरे धीरे किसी तरह खड़े हुए और पास वाले पेड़ की ओर इशारा किया. उन्हें पेड़ के साथ पीठ लगा कर खड़े होना था. सांस धीरे धीरे नार्मल हो रहा था पर चेहरे पर तनाव और पीड़ा थी. रुकते अटकते बात करने लगे.
- मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था. ओवर कॉन्फिडेंस में इतनी दूर आ गया.
- कोई बात नहीं थोड़ा रुकिए यहीं पर सुस्ता लीजिये. फिर आपको मैं घर छोड़ आता हूँ. मुझे कौन सा ऑफिस जाना है मैं भी आप की तरह पेंशनर हूँ.
- मुझे नहीं आना चाहिए था यहाँ.
- कौन से नम्बर में हैं आप? पहले आपको कभी पार्क में देखा नहीं.
- मैं 116 में हूँ. ओह राजेश नाराज़ हो जाएगा. मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था. वो मेरा बड़ा बेटा है ना. मुझे गाड़ी में यहाँ अपने घर ले आया था चार दिन पहले. रुक-रुक कर बोले जा रहे थे बुजुर्गवार.
- हाँ 116 वाले नरूला जी को मैं जानता हूँ. अभी आप चल सकते हो तो मैं वहां तक छोड़ आता हूँ. या अगर आप कहो तो राजेश को यहीं बुला लाता हूँ.
- न न न मुझे अभी दस मिनट रुकने दो यहीं. नार्मल होने दो ज़रा. राजेश गुस्सा करेगा की मैं यहाँ तक क्यूँ आ गया. हाँ यहीं रुकता हूँ ज़रा. प्लीज़ आप भी रुको मेरे पास. आप के साथ धीरे धीरे चलता जाऊँगा. हांफते हुए और रुक रुक कर नरूला साब बात कर रहे थे.
- 85 पूरे हो गए हैं जी मैं आपको बताऊँ. बाएँ कूल्हे का ऑपरेशन हुआ है जी. एक बेटा और एक बेटी और भी है जी. बच्चों की माँ तो 20 साल पहले ही चली गई.
कहते कहते नरूला जी का गला रुंध गया और आँखों में आंसू आ गए. वो थोड़ी देर के लिए चुप हो गए. संभल कर फिर रुकते अटकते बोलने लगे.
- राजेश सुनेगा तो गुस्सा करेगा उसे मत बताना जी. मैंने ही तीनों शादियां कराई, दोनों बेटे के मकान बनवाए जी और दोनों के केमिकल के बिजनेस भी सेट करा दिए जी.
नरूला साब की आँखों में फिर से आंसू आ गए. छोटा तौलिया जेब से निकाल कर मुंह पोंछा.
अब हम दोनों 116 नम्बर की तरफ एक एक कदम बढ़ा रहे थे. निरुला साब रुक रुक कर भावुकता में बोलते जा रहे थे और मैं हाँ हूँ करता जा रहा था.
गेट पर जैसे ही मैंने घंटी बजाई राजेश नरूला तपाक से बाहर आ गए. कोई नमस्ते या गुड मोर्निंग नहीं की. क्रोध और खीझ से भरी आवाज़ में तुनक के बोले,
- क्या करते हो पापा? बिना बताए बाहर निकल गए? चला आप से जाता नहीं और बताते भी नहीं.
- नमस्ते राजेश. अरे हम तो गपशप लगा रहे थे बस, मैंने कहा तो राजेश झेंप कर बोले ,
- जी नमस्ते अंकल. क्या करूँ पापा ने परेशान कर रखा है.

बाप बेटा


Monday, 14 March 2016

गौतम बुद्ध के पद चिन्हों पर - 3

सन्यासी के रूप में 29 वर्षीय राजकुमार सिद्धार्थ महल छोड़ कर जंगलों की ओर निकल पड़े. उस समय के ज्ञानी साधुओं, सन्यासियों और विचारकों से मिले, विचारों का आदान प्रदान किया. पहले पहल मिलने वालों में से प्रमुख थे आलार कालाम और उद्दक रामपुत्र. इनसे उन्होंने योग ध्यान और समाधि में बैठना सीखा पर संतोषजनक उत्तर न मिलने पर वे आगे बढ़ते रहे.

उस समय वेद, पुराण और उपनिषद का प्रचलन था. उस समय के समाज में वर्ण व्यवस्था - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, भी प्रचलित थी. राजकुमार सिद्धार्थ स्वयं क्षत्रिय थे. साथ ही उस समय जीवन को चार आश्रमों - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में बांटने का भी प्रचलन था जिसका जिक्र जातक कथाओं में आया है.

वेद, पुराण और जैन धर्म ग्रंथों का समय-क्रम पक्का नहीं है. इनका रचनाकाल सम्भवतः 1500 से 75000 वर्ष ईसापूर्व में कब रहा होगा कहना मुश्किल है. इस पर इतिहासकारों में भारी मतभेद हैं. पर यह तो जाहिर है कि उस समय आत्मा, परमात्मा, दर्शन और धर्म की बहुत सी विचार धाराएं साथ साथ ही चल रहीं थीं. वैदिक साहित्य में उस समय के जीवन के मूल विषयों पर मन्त्रों और श्लोकों में जो चर्चा है वो किसी ना किसी रूप में आज भी हमें प्रभावित करती हैं.

वैदिक साहित्य को चार मुख्य भागों में बांटा जा सकता है : 'संहिता' में मन्त्रों और स्तुतियों का संग्रह है जैसे कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद.
'ब्राह्मण' ग्रंथों में यज्ञ करने की विभिन्न विधियाँ, उनके उद्देश्य और उनसे प्राप्ति की चर्चा है.
'आरण्यक' ग्रंथों में वानप्रस्थ और आध्यात्म की चर्चा है और
'उपनिषद' में आत्मा, ब्रह्म और आध्यात्म की चर्चा है.
वेदों पर आधारित 6 मुख्य दर्शन हैं जो सभी आस्तिक दर्शन कहलाते हैं:
* न्याय दर्शन जिसमें परमात्मा को सर्वव्यापी और निराकार कहा गया है. प्रकृति को अचेतन और आत्मा को शरीर से अलग कहा गया है. यह दर्शन महर्षि गौतम द्वारा रचित है.
* वैशेषिक दर्शन में वेदों को ईश्वर का वचन माना गया है. मनुष्य के कल्याण और उन्नति के लिए धर्म पर चलना आवश्यक बताया गया है. महर्षि कणाद के अनुसार जीव और ब्रह्म अलग अलग हैं और एक नहीं हो सकते.
* सांख्य दर्शन महर्षि कपिल द्वारा रचित है. इसमें कहा गया है कि प्रकृति अचेतन और शाश्वत है पर मनुष्य चेतन है और प्रकृति को भोगता है. असत्य से सत्य की उत्पति नहीं होती और सत्य कारणों से ही सत्य कार्य होते हैं.
* योग दर्शन में परमात्मा और आत्मा का मिलन यौगिक क्रियाओं द्वारा कराने की बात कही गई है. इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर ध्यान और समाधि लगाने से आत्मा परमात्मा का 'योग' संभव है. अंतःकरण शुद्धि पर महर्षि पतंजलि ने ज्यादा जोर दिया है.
* महर्षि जैमिनी द्वारा रचित मीमांसा दर्शन वेद मन्त्र और वैदिक क्रियाओं को सत्य मानता है. यह दर्शन उन्नति के लिए पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों पर ज्यादा जोर देता है.
* वेदांत दर्शन या उत्तर मीमांसा महर्षि व्यास द्वारा ब्रह्मसूत्र में रचित है. इसमें कहा गया है कि ब्रह्म सर्वज्ञ है पर निराकार है और जन्म-मरण से ऊपर है पर आत्मा से अलग है. मीमांसा में भी आगे चल कर कई धाराएं चल पड़ी - द्वैत, अद्वैत, विशिष्ठाद्वैत.

इन दर्शन शास्त्रों के अतिरिक्त नास्तिक विचार भी उस समय प्रचलित थे. ईश्वर और परलोक ना मानने के कारण इस दर्शन को लोकायत भी कहा जाता है.
परलोक को ना मानने वाले, केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण मानने वाले और वेदों से असहमति रखने वाले दर्शन हैं: चार्वाक, माध्यमिक, योगाचार, सौतांत्रिक, वैभाषिक और आर्हत.
जैन दर्शन में भी नास्तिकता का पुट है. जैन दर्शन में ऐसा माना गया है कि सृष्टि शाश्वत है और सृष्टि का कोई सृष्टिकर्ता नहीं है. जीव स्वयं अपने पिछले जन्मों के कर्मों से सुख-दुःख पाते हैं. जैन धर्म में अहिंसा परम धर्म है. साथ ही मन, वाणी और काया पर जीत करने वाला 'जिन' या अरहंत कहलाता है. इन्हीं के मंदिर बनाए जाते हैं और किसी भगवान के नहीं.

कुल मिला के इस तरह की आस्तिक और नास्तिक वादों की 60-65 विचार धाराएं राजकुमार सिद्धार्थ के सन्यास लेने के समय में प्रचलित थीं. मोटे तौर पर इन्हें दो धाराओं में बांटा जा सकता है. पहली धारा वैदिक ज्ञान और मान्यताओं से जुड़ी थी. दूसरी धारा उन लोगों की थी जो वैदिक कर्मकांडों से अलग प्रकृति के नियमों में जीवन यापन करना चाहते थे. इन्हें श्रमण या श्रमन कहा जाता था और ये लोग मूलतः जिज्ञासु रहे होंगे. चूँकि श्रमणों का प्रकृति पर ज्यादा जोर था इसलिए वो ज्यादातर समाज से दूर जंगलों में ही विचरते रहते थे और अपने साथ कम से कम सुविधाएँ रखते थे. शायद जिज्ञासु राजकुमार सिद्धार्थ महल छोड़ने के लिए इनसे प्रभावित हुए हों.

जैन मंदिर, कमल बस्ती, बेलगाम, कर्नाटक

नोट: मैं भी जिज्ञासुओं की तरह गौतम बुद्ध का फलसफा या दर्शन समझने के लिए बुद्ध की जीवनी, उस वक्त का इतिहास और बुद्ध के प्रवचन पढ़ रहा हूँ. सम्बंधित ब्लॉग में दिए गए मेरे विचार बहुत सी किताबों, त्रिपिटक के अंश और इन्टरनेट में मिली जानकारी पर आधारित हैं. भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ.


-----आगे क्रमशः जारी रहेगा.


Sunday, 13 March 2016

लैंसडाउन, उत्तराखंड की पहाड़ियां

लैंसडाउन एक छावनी है जो की पौड़ी गढ़वाल ज़िले में स्थित है. 
इसकी उंचाई 1700 मीटर है और दिल्ली से लगभग 270 किमी की दूरी पर है. 
दिल्ली से मेरठ > नजीबाबाद > कोटद्वार होते हुए 5 - 7 घंटे में लैंसडाउन पहुँचा जा सकता है. 
यह ६ वर्ग किमी में पहाड़ीयों पर फैला हुआ है. इसका स्थानीय नाम कालूडांडा (काली पहाड़ी) है. 
इसे 1887 में भारत के वाइसराय लार्ड लैंसडाउन ने बसाया और उद्देश्य था गढ़वाल राइफल्स का ट्रेनिंग सेंटर स्थापित करना. 
यहाँ का सालाना तापमान (-)4 डिग्री से लेकर 30 डिग्री तक जा सकता है. 
आस पास की पहाड़ियों पर चीड़ और देवदार के जंगलों से काफी हरियाली और ठंडक है.
आस पास लिए गए कुछ चित्र:

शाम के समय

पहाड़ी नदी कोटद्वार की ओर जाती हुई 

चलो पाठशाला चलें 
सूर्योदय
मस्ती की पाठशाला
चीड़ का जंगल और घुमावदार रास्ता 


Friday, 11 March 2016

गौतम बुद्ध के पद चिन्हों पर - 2

गौतम बुद्ध का जन्म 2500 साल पहले शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी वन में हुआ. उनके पिता राजा शुद्धोधन थे और माँ का नाम माया था. माँ का निधन बेटे के जन्म के सात दिन बाद ही हो गया था इसलिए पालन पोषण मौसी महाप्रजावती (जो राजा शुद्धोधन की दूसरी रानी थी) ने किया. जन्म के समय उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया था. सिद्धार्थ के जन्म के बाद राज्य के 8 प्रमुख ब्राह्मणों ने राजा से कहा कि ये बालक या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर महाज्ञानी संत. राजा की इच्छा थी की राजकुमार सिद्धार्थ आगे चल कर सम्राट बने इसलिए भविष्य में राज्य का कार्यभार सँभालने के लिए उन्हें युद्ध विद्या, हथियारों और धर्म ग्रंथों की शिक्षा दी गई. राजकुमार के लिए हर तरह की सुख सुविधा और विलासिता के प्रयोजन किये गए. 16 बरस में उनका विवाह यशोधरा से हुआ और बाद में पुत्र राहुल का जन्म हुआ.

राजा चाहते थे की सिद्धार्थ राजकाज चलाए और महल छोड़ कर संत न बन जाए. इसलिए राजा ने सिद्धार्थ के लिए तीन सुंदर महलों का निर्माण कराया जहाँ वे तीन अलग अलग मौसमों में रहते थे. उनकी सेवा में कोई भी बूढ़ा सेवक या बूढ़ी सेविका नहीं रखी जाती थी. सभी तरह की सुख सुविधाएं और मनोरंजन के साधन महल में ही मुहैय्या करा दिए जाते थे ताकि बाहर जाने की आवश्यकता ना पड़े. उनके पीछे एक सेवक हमेशा एक छत्र लेकर चलता था ताकि उन पर धूप या बारिश ना गिरे. पर फिर भी राजकुमार सिद्धार्थ ने एक दिन महल और परिवार त्याग दिया.

ऐसा क्यों किया एक राजकुमार ने?

एक दिन महल से बाहर राजकुमार सिद्धार्थ घूमने निकले तो उन्हें पहली बार एक बूढ़ा व्यक्ति दिखाई पड़ा. उसके दांत नहीं थे, बाल उड़ चुके थे और चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हुई थी और वो लाठी लेकर चल रहा था. उन्हें लगा कि क्या मैं भी ऐसा ही हो जाऊँगा? दूसरी बार जब राजकुमार बाहर निकले तो एक रोगी देखा. चेहरा पीला पड़ा हुआ, साँस मुश्किल से आ रही थी और चला भी नहीं जा रहा था. राजकुमार सिद्धार्थ ने सोचा क्या ऐसा सभी के साथ होता है? ऐसा क्यूँ होता है? तीसरी बार महल से बाहर निकलने पर राजकुमार ने पहली बार एक अर्थी देखी जिसके पीछे पीछे परिजन रोते बिलखते जा रहे थे. राजकुमार सोच में पड़ गए कि क्या राजा और रंक सभी मर जाते हैं? चारों ओर दुःख फैला हुआ है और मैं विलासिता में रह रहा हूँ? चौथी बार महल से बाहर निकले तो कमंडल लिए हुए एक प्रसन्न साधु देखा. उनके मन में विचार आया कि इस साधु की तरह से स्वतंत्र रहना कितना अच्छा है!

इन घटनाओं की देख कर सिद्धार्थ का मन बैचैन रहने लगा था. एक दिन उन्होंने रात के समय रथ निकलवाया और जंगल की ओर प्रस्थान कर दिया. जंगल के सिरे पर सिद्धार्थ ने बाल काट दिए, राजसी गहने कपड़े उतार कर चन्ना रथवान को दे दिए और उसे वापिस भेज दिया. एक कमंडल और तीन वस्त्रों में जीवन के रहस्य की खोज में निकल पड़े. उस समय उनकी उम्र 29 साल की थी.

चलें सत्य की खोज में 

-----क्रमशः जारी रहेगा 

Monday, 7 March 2016

गौतम बुद्ध के पद चिन्हों पर - 1

काफी बरस पहले शायद 1993 में स्वर्गीय श्री एस.एन. गोयनका जी द्वारा तिहाड़ जेल, नई दिल्ली में कैदियों के लिए विपासना कैम्प की शुरूआत की थी. उस वक़्त के अखबारों में उस विपासना कैम्प की चर्चा हुई और फिर घर पर भी. तब मुझे ऐसा लगा था कि गोयनका जी कोई मनोवैज्ञानिक होंगे और कैदियों को 'विपासना' द्वारा सुधारने की कोशिश कर रहे होंगे. हमारे जैसे लोगों को विपासना से क्या लेना देना. बात आई-गई हो गई.

रिटायरमेंट के बाद समय था तो फिर से विपासना के बारे में इन्टरनेट पर खोजबीन शुरू की. पता लगा कि विपासना या विपश्यना तो मैडिटेशन या ध्यान या समाधि लगाने की एक प्राचीन विधि है जिसे गौतम बुद्ध ने पुनर्जीवित किया था और इसी विधि को अपनाकर निर्वाण का रास्ता खोज निकाला. विपासना शब्द गूगल करने से बहुत सी जानकारी ले सकते हैं. विपासना शिविर की व्यवस्था भारत और विश्व के बहुत से शहरों में है उसकी जानकारी भी ले सकते हैं.

विपासना पाली भाषा का एक शब्द है और विपश्यना संस्कृत का. विपश्यना का शाब्दिक अर्थ तो है अच्छी तरह से देखना या ठीक से देखना. जो जैसा है उसे ठीक वैसा ही देखना ना घटाना ना बढ़ाना. याने reality check.
पहले समय में कहा जाता था की सूरज पूर्व में 'उगता' है और पश्चिम में 'डूबता' है. पर बाद में खोज-बीन द्वारा यह सत्य पाया गया कि सूरज भी घूम रहा है और धरती भी सूरज की परिक्रमा कर रही है. इसलिए सूरज का पूर्व में 'उगना' और पश्चिम में 'डूबना' सही नहीं बल्कि कल्पना है.

आज के मनुष्य का शरीर, उसकी इन्द्रियां, शरीर की जरूरतें और मन में आते विचार वैसे ही हैं जैसे बुद्ध के समय में या उनसे भी पहले थे. मन में लगाव, राग-द्वेष, इर्ष्या, भय, लालच, आसक्ति, गुस्सा और प्रतिशोध की भावनाएं वैसी ही हैं. आज भी मन की इच्छा न पूरी होने पर हम दुखी होते हैं, आज भी अनहोनी से भय लगता है और आज भी अपनों से बिछड़ने में दुःख घेर लेता है. सब कुछ ठीक चल रहा हो तो अचानक नई समस्या बिन बुलाए आन खड़ी हो जाती है. और कुछ नहीं तो सफ़ेद बाल निकल आना या प्रमोशन ना होना ही ब्लड प्रेशर बढ़ा देता है.

और ये समस्याएँ केवल मेरी या आपकी नहीं हैं बल्कि हरेक की हैं. हर कोई इन्हीं में उलझा हुआ है. और इन समस्याओं के आने का कारण कोई ख़ास उम्र, या ख़ास स्थान या घटना या ख़ास व्यक्ति नहीं है बल्कि ये एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है. अंतर्मन की ये प्रक्रिया ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती. एक के बाद एक उलझनें अंतर्मन में जमा होती जाती हैं और परेशान करती हैं.

और इसके साथ ही शुरू हो जाती हैं धार्मिक गुरुओं और स्थानों की तलाश जहाँ से कुछ सुकून मिल सके. कभी मन की शांति मिल भी जाती है कभी नहीं भी और कभी कुछ देर के लिए. और कभी ऐसा भी हो जाता है कि गुरुजी भी घोटाला कर जाते हैं.
निकले तो थे खुशी ढूंढने पर दुःख पीछा करने लगे. इस पर कपिल कुमार की लाइनें याद आ गई:
'हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है,
कोई हमदर्द नहीं दर्द मेरा साया है!'

हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है 



----- क्रमशः जारी रहेगा.                                                                               

Friday, 4 March 2016

बदलाव

पिछले दिनों लैंसडाउन, पौड़ी गढ़वाल की तीन दिन की यात्रा की. कुछ गाँव तो जीप में बैठे-बैठे देखे और कुछ अपनी गाड़ी ऊपर होटल में ही छोड़ कर पैदल आने जाने में देखे. ऐसी ही यात्रा 20-25 साल पहले भी की थी. तो यह सवाल स्वाभाविक था कि यहाँ क्या बदलाव आया?

गाँव में घुसते ही स्वागत करने वालों में थे बुज़ुर्ग और बुज़ुर्ग. पहले भी यही हाल था वैसे तो पर इस बार ज्यादा महसूस हुआ. मनीआडर और पेंशन अर्थ व्यवस्था बदस्तूर जारी है. हाँ लाइट और पानी की सप्लाई आ गई है. पर छोटे छोटे गाँव में अभी सड़क का इंतज़ार है, रसोई गैस का इंतज़ार है. शौचालय का इंतज़ार है और चिकित्सा सुविधा का इंतज़ार है.

स्कूल में विद्यार्थी ज्यादा हैं, पढने वाली लड़कियां ज्यादा हैं पर स्कूल अभी घर से दूर ही हैं ख़ास तौर से प्राइमरी स्कूल. साथ ही एक और दुविधा है कि अगर बच्चा अच्छा पढने वाला निकला तो घर से दूर हो जाएगा. बहुत पढ़ाकू होगा तो विदेश पहुँच जाएगा!

स्थानीय नौकरियाँ कम हैं इसलिए फ़ौज और सरकारी नौकरी ढूंडते-ढूंडते लोग दूर से दूर निकल जाते हैं और फिर पलट कर आना मुश्किल हो जाता है. पहाड़ी गाँव सुंदर हैं इनमें खेती लायक जमीन भी हैं पर मशीनीकरण नहीं है और होना भी मुश्किल है. इसलिए कमरतोड़ मेहनत है पर कमाई कम है. इसलिए भी गाँव से पलायन हो रहा है.

प्रदेश सरकार और बैंक बहुत से काम धंधों के लिए पैसे देते हैं पर अपनी पूँजी का अभाव है, अनुभव का अभाव है और उद्यम चलाने की ट्रेनिंग का अभाव है. इन अभावों के चलते ज़्यादातर होटल और उद्योगों में मालिकाना हिस्सा कम है. पर नौकरियां जरूर मिल रही हैं.

पहाड़ी गाँव का एक घर - एक ओर सूखी लकड़ियाँ जो चूल्हे में और सर्दी में काम आएंगी, घर के नीचे चारे का ढेर और कुछ फलों के पेड़ 

टेढ़ी-मेढ़ी राहें

भगवान सबका भला करे

पर बदलाव तो है और अच्छे के लिए है. होटल खुले हैं तो टूरिस्ट भी आएंगे, टैक्सी भी इस्तेमाल करेंगे, स्थानीय चीज़ें भी बिकेंगी और नौकरियां भी मिलेंगी. पर स्थानीय सरकार को पर्यावरण का भी विशेष ध्यान रखना होगा. हिमालय की इकोलॉजी बहुत नाज़ुक दौर से गुज़र रही है.  
उत्तराखंड बिजली सरप्लस राज्य है. इसीलिए गाँव गाँव में बिजली पहुँच गई है जबकि और राज्यों में अभी ऐसा नहीं है. उम्मीद है कि आगे भी तरक्की जारी रहेगी.

सोलर का इस्तेमाल कम बिजली का ज्यादा - लिफ्ट लग रही हैं, हर बाथरूम में बिजली के गीज़र लग रहे हैं 

होटलों के साथ आए भारी भरकम जेन-सेट 

नदी तट पर बहु मंजिला इमारत. पानी कहाँ से लेंगे? बोरिंग कर लेंगे!

जनता के लिए कच्ची धूल भरी सड़कें हैं ना!

हरियाले जंगल में कंक्रीट जंगल की शुरुआत 



Thursday, 3 March 2016

नवाब फन्ने खां का गुड़

नवाब फन्ने खां गर्मी से परेशान हो रहे थे. तख्ते ताउस पर बैठे पंखा झलने वालों को कोस रहे थे. कमबख्त दो दो गुलाम ड्यूटी पर लगा रखे हैं पर हवा ही नहीं लग रही है. पंखों पर पानी छिड़क दिया गया और इत्तर भी डाल दिया गया पर साहब कोई फर्क नहीं पड़ा. नवाब बार बार अपने टकले सिर पर रूमाल से पसीना पोंछ रहे थे. उधर पंखा झल-झल कर दोनों गुलाम पसीने पसीने हो रहे थे.

वज़ीरेआला ने भांप लिया और नवाब के कुंडल से सजे हुए कान में फुसफुसाया:
- हुज़ूर क्यूँ ना आप पहाड़ी नदी किनारे 2-4 दिन का ब्रेक ले लें ज़रा सुकून मिलेगा इस गर्मी से.
- वाह बहुत अच्छे. तैयारी करवाई जाए.

अगली सुबह भारी भरकम नवाब साहब को चार नौकरों ने मिल कर घोड़े पर बैठा दिया. नवाब साब के घोड़े के पीछे दो हथियार बंद घुड़सवार और उनके पीछे दो अदद खानसामें भी अपना टीरा- टंडीरा लेकर चल दिए.

जंगल में पहुंचते ही दुश्मनों ने घेर लिया. दोनों सवारों ने किसी तरह नवाब साहब को झाड़ियों में छुपा दिया. खानसामे भाग लिए, माल-टाल और घोड़े लूट लिए गए. और एक सवार भी गायब हो गया. कुछ देर छुपने के बाद गिरते-पड़ते और हांफते हुए नवाब साब अपने सवार के साथ एक झोंपड़ी तक जा पहुंचे.
- अरे कोई है? पानी मिलेगा क्या?
अंदर से किसान निकला और बोला,
- मिलेगा हुज़ूर जरूर मिलेगा. पानी क्या आपको रस पिलाता हूँ हुज़ूर तबियत खुश हो जाएगी. आप दोनों खटिया पर तशरीफ़ रखिये हुज़ूर. बहुत थके हुए लगते हैं.
वो किसान खेत की तरफ गया, गन्ने तोड़े और दो कटोरे रस भर कर ले आया.
- भई वाह बड़ी राहत मिली और जी खुश हो गया. बोलो बदले में क्या लोगे?
- हुज़ूर कुछ नहीं चाहिए. दाता ने बहुत कुछ दिया है हुज़ूर.
- बहुत खूब. अच्छा तुम हमें पहचानते हो?
- ना हुज़ूर आपको कभी देखा नहीं.
- ये दो कटोरे रस कितने गन्नों में से निकाला?
- सिर्फ दो गन्नों से हुज़ूर.
- बहुत खूब बहुत खूब. अब हम चलते हैं.

अगले दिन नवाब फन्ने खां ने दरबार में वज़ीरे खज़ाना को तलब किया.
- कल हमें झुमरी तल्लिय्या के जंगल में जाने का मौक़ा मिला. कुछ पता है वो इलाका कैसा है?
- जंगल है हुज़ूर जंगल.
- खामोश! उस जंगल में गन्ने की खेती हो रही है. गन्ने में से रस निकाला जा रहा है. रस में से गुड़ बनाया रहा है. गुड़ में खज़ाना है. कुछ समझे वज़ीरे खज़ाना? कुछ खबर है आपको जनाब ?
- जी नहीं हुज़ूर?
- खामोश! फ़ौरन टैक्स लगा दो!

नवाब साब का दीवाने-ख़ास 


Tuesday, 1 March 2016

दुगड्डा, उत्तराखंड

कोटद्वार - पौड़ी मार्ग पर खोह ( खो ) नदी पर बसा दुगड्डा छोटा गाँव है. पौड़ी से लगभग 50 किमी दूर और देहरादून से 100 किमी है. दुगड्डा की उंचाई लगभग 3000 फीट है. दिल्ली से मेरठ बिजनोर होते हुए लगभग 225 किमी है और NH 58 + NH 119 का उपयोग किया जा सकता है. लगभग 5 - 6 घंटे का रास्ता है.

1953 में कोटद्वार रेलवे स्टेशन बनने के बाद दुगड्डा का व्यापारिक महत्व घट गया क्यूंकि कोटद्वार व्यापर का केंद्र बन गया. मोटर मार्ग बनने से पहले उपरी क्षेत्र के लोग खोह नदी के किनारे-किनारे नीचे आया करते थे ओर रसद खच्चरों की सहायता से ऊपर पहुँचाया जाता था.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :

लैंसडाउन से नीचे बाँए दुगड्डा 5 किमी और सीधा सामने पौड़ी की ओर जाती सड़क 

सुबह सुबह की धूप में दुगड्डा के हरे भरे खेत 

दुगड्डा पुल खो नदी पर 
सेंधीखाल होते हुए जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का रास्ता
हरा भरा दुगड्डा

दुगड्डा की निशानी 'वाटर मार्क' . पहाड़ों में से रिसता हुआ ये ठंडा पानी निरंतर चलता रहता है और यात्रियों में बहुत लोकप्रिय है