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Saturday, 14 October 2017

पिंक दुप्पट्टा

शौपिंग का अपना का फंडा सीधा है - मॉल में गए, दूकान में गए और 15-20 मिनट में जीन या शर्ट या जूते फाइनल कर दिए. पर श्रीमती के साथ ऐसा नहीं है. इस शॉप में देखो, उस शॉप में देखो. कलर देखो, कपड़ा देखो, टेक्सचर देखो, कीमत देखो और टीवी शो से स्टाइल देखो. इस वजह से महिलाओं का शौपिंग में टाइम ज्यादा लगता है. ये तो हमारे दोस्त नरूला जी का भी व्यक्तिगत अनुभव है कि श्रीमती के साथ जब शौपिंग करने जाते हैं तो शेव करके और परफ्यूम लगा कर जाते हैं. पर शौपिंग खत्म होते होते तक दाढ़ी बढ़ चुकी होती है और परफ्यूम ख़त्म हो चुकी होती है !
खैर घूमने निकले थे मेरठ की आबू लेन याने यहाँ के कनॉट प्लेस में. कई छोटी बड़ी दुकानों में नज़र मारते रहे. अचानक एक पिंक सूट पसंद आ गया. ट्राई कर लिया, पैक करा लिया और मैंने क्रेडिट कार्ड चला दिया.
- तो अब चलें ?
- अभी कहाँ चलें ? दुपट्टा भी तो लेना है. सदर में मिलेगा.
सदर की दो तीन दुकानों में से एक में सफ़ेद शिफोन का दुप्पट्टा पसंद आ गया, पैक करा लिया और मैंने क्रेडिट कार्ड चला दिया.
- तो अब चलें ?
- अभी कहाँ चलें ? कलर भी तो कराना है. आगे चौक में रंग वाले बैठते हैं वहां चलते हैं चलो.
रंगरेजवा ने थोड़े नखरे दिखाए पर फिर आधे घंटे में कर ही दिया. कैश देकर मैंने पूछा,
- तो अब चलें ?
- अभी कहाँ चलें ? अभी तो पीको करानी है. चूड़ी बाज़ार चलो.
पीको हो गई और मैंने पैसे देकर पूछा,
- तो अब चलें ?
- अभी कहाँ चलें ? आबू लेन की चाट नहीं खिलाओगे ?

तब तक रंगरेज की कारवाई देखिये :
भैया ये दुप्पट्टा कलर करना है? - कर देंगे जी. कितनी देर लगेगी ? - कल ले जाना. - नहीं भैया नहीं हमें तो अभी दिल्ली वापिस जाना है. जल्दी कर दो  - आधा घंटा तो लगी जाता है. - ठीक है हम वेट कर लेते हैं  

एक चम्मच रंग डाला बाल्टी में थोड़ा गरम पानी डाला और सफ़ेद दुपट्टा डुबो दिया 

अब दुप्पट्टे को उबलते पानी में  डाल दिया और डंडे से हिलाया पर लगता है रंग अभी नहीं मिला 

कुछ और 'मसाला' डाल कर दुप्पट्टा घुमाया. अब मिला कर देखा. हाँ अब रंग टैली हो गया. ओके है जी ओके  

रंगाई और फिर सुखाई बस निपट गया मामला 



Tuesday, 10 October 2017

वाकाटीपू झील, न्यूज़ीलैण्ड

वाकाटीपू झील न्यूज़ीलैण्ड के दक्षिणी  द्वीप में है. न्यूज़ीलैण्ड छोटे बड़े द्वीपों पर बसा देश है जिसकी जनसँख्या 48.19 लाख है. यहाँ दो मुख्य द्वीप हैं उत्तरी द्वीप और दक्षिणी द्वीप और इसके अतिरिक्त छोटे बड़े 600 द्वीप हैं जिनमें से पांच टापुओं के अलावा बसावट बहुत कम है.
* न्यूज़ीलैण्ड ऑस्ट्रेलिया से 1500 किमी पूर्व में है.
* देश की राजधानी वेलिंगटन है और यहाँ की करेंसी है न्यूज़ीलैण्ड डॉलर NZD. ये डॉलर आजकल लगभग 47 भारतीय रूपये के बराबर है.
* न्यूज़ीलैण्ड का प्रति व्यक्ति GDP( nominal) 36,254 डॉलर है और PPP के अनुसार 36,950 डॉलर है. इसके मुकाबले भारत का GDP ( nominal ) का 2016-17 का अनुमानित आंकड़ा थोड़ा कम है याने प्रति व्यक्ति 1800 डॉलर है. याने हिन्दुस्तानियों को कमर कस कर मेहनत करनी पड़ेगी.
* यहाँ के मूल निवासी माओरी कहलाते हैं. जनसँख्या में इनका अनुपात 14.9 % है और सरकारी काम काज के लिए इंग्लिश के अलावा माओरी भी यहाँ की सरकारी भाषा है.
* भारत की तरह न्यूज़ीलैण्ड में भी गाड़ियां बाएं ही चलती हैं. आप अपने देसी लाइसेंस और पासपोर्ट दिखा कर कार या कारवान किराए पर लेकर खुद चला सकते हैं. गाड़ी चलाते चलाते पहुंचे वाकाटीपू झील. रास्ता भी बेहद खुबसूरत है और झील भी. ऐसा लगता है कि किसी पेंटिंग को देख रहे हैं. 
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :  

खुबसूरत पेंटिंग की तरह 

झील का एक दृश्य 

75 किमी लम्बी, 290 वर्ग किमी में फैली और 380 मीटर तक गहरी झील 

झील पर उतरती शाम 

सुंदर और शांत 

झील किनारे 

प्राकृतिक सौन्दर्य - पहाड़, पानी, पेड़ और पक्षी 

इतनीीी ऑक्सीजन ले चलता हूँ दिल्ली 
NASA False-colour satellite image of Lake Wakatipu from Wikipedia 


पूनाकैकी, न्यूज़ीलैण्ड पर फोटो ब्लॉग का लिंक है :
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/09/blog-post_29.html


पैनकेक रॉक्स, न्यूज़ीलैण्ड पर फोटो ब्लॉग का लिंक है :
http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/10/blog-post.html



Contributed by Mukul Wardhan from New Zealand - न्यूज़ीलैण्ड से  मुकुल  वर्धन की प्रस्तुति   




Saturday, 7 October 2017

विपासना मैडिटेशन का आठवाँ और नौंवा दिन

मैडिटेशन के आठवें दिन आने तक आश्रम की दिनचर्या के अभ्यस्त हो गए थे. सुबह चार बजे की घंटी बजते ही बिस्तर छोड़ देना और साढ़े चार बजे की पहली मैडिटेशन क्लास से लेकर रात साढ़े नौ तक ध्यान लगाना और ठीक 10 बजे तक कुड़क जाना. ये कार्यक्रम अब पटरी पर आ गया था. पहली बार के शिविर में उकताहट और झुंझलाहट ज्यादा थी पर दूसरे शिविर में घट गई थी. फिर भी एक घंटे की ध्यान मुद्रा में पांच दस मिनट ऐसे आ ही जाते थे जिसमें मन विचलित हो जाता था. एक कारण तो शारीरिक थकावट थी. दूसरा ये सवाल बार बार मन में उठाता था कि इस वक़्त किये जाने वाली क्रियाओं में और गौतम बुद्ध के उपदेशों में सामंजस्य है या नहीं और कैसे होगा ? गोयनका जी का शाम का विडियो प्रवचन बढ़िया होता है पर कई चीज़ें उस वक़्त नहीं समझ पाया. और चूँकि वीडियो लेक्चर था इसलिए कोई प्रश्न पूछना संभव नहीं था. मुझे लगा की पढ़ कर आना चाहिए था.

गौतम बुद्ध के उपदेशों में कहा गया है की जब भी मन( या माइंड या चित्त ) में क्रोध, लोभ, द्वेष, मोह, पश्चाताप, बेचैनी, उदासी वगैरा जैसी भावनाएं आती हैं तो सांस की रफ़्तार  प्रभावित हो जाती है. साथ ही शरीर में कुछ हलचल या संवेदनाएं होने लगती हैं. ये संवेदनाएं सुखद या दुखद या neutral( असुखद-अदुखद) हो सकती हैं जैसे की सिहरन, गला भर आना, आंसू आ जाना, भय से ठंडा पसीना आ जाना, क्रोध में आँखें लाल हो जाना, रौंगटे खड़े हो जाना, चेहरे पर मुस्कान आ जाना इत्यादि. अभ्यास करते करते और बारीक संवेदनाएं भी पता चलती हैं.

अब अगर किसी सुखद संवेदना से अगर आप जुड़ते हैं तो  सुखद अनुभूति होती है और दुखद संवेदना से चिपके तो दुखद. जुड़ाव होने से शरीर में कुछ जैविक( bio-chemical) क्रियाएँ शुरू हो सकती हैं. फिर विचार बनने लगते हैं और फिर कोई कर्म शुरू होने लगता है. ये कर्म कोई न कोई नतीजा लाते हैं चाहे सुखद हो या दुखद. इस तरह से बात आगे बढ़ती जाती है. पर अगर किसी संवेदना से नहीं जुड़े तो वो संवेदना स्वत: नष्ट हो जाती है.

पर संवेदना का आने जाने का सिलसिला जारी रहता है रुकता नहीं है क्यूंकि हमारी पांच इन्द्रियां और मन कुछ ना कुछ हरकत करते रहते हैं. कभी एकांत में एकाग्र चित्त बैठ कर इस मानसिक क्रिया को देखेंगे तो लगेगा कि इस छोटी सी बात में याने संवेदना के आने और जाने में गहरा अर्थ छुपा हुआ है. यह बात पढ़ कर, सुन कर या बहस कर के नहीं बल्कि स्वयं अभ्यास करके समझनी पड़ेगी. और इस शिविर में हम यही कर रहे थे.

मान लीजिये की दस साल पहले किसी दोस्त ने आपको बुरा भला कहा था और गालियाँ दी थी और उसके बाद दोनों के रास्ते अलग अलग हो गए थे. आज वो इतने समय बाद सामने से निकला पर उसने आपको नहीं देखा ना ही कोई बातचीत हुई. उस एक क्षण में आपके अंदर क्या क्या संवेदनाएं आ सकती हैं - क्रोध, खीज, उलाहना, दुःख, ग्लानी, खुद पर दया, उस पर दया ? इन संवेदनाओं के आधार पर आप क्या क्या कर सकते हैं - गाली देना, पत्थर मार देना, अपने को कोसना, मुंह फेर लेना, सर झुका लेना, वापिस मुड़ जाना, उसे माफ़ कर देना या फिर इन सब में उलझ जाना या कुछ भी ना करना ? क्या इन संवेदनाओं में से कोई एक या सभी को चिपका लेंगे या नष्ट होने देंगे ?

आठवें दिन कुछ देर बारिश हुई तो देखा की कैंपस में खड़ी अपनी कार भी बारिश में धुल रही है. बहुत धूल जम गई थी गाड़ी पर चलो ये काम ठीक हुआ. मौसम भी ठंडा और सुहाना हो गया था. उसके बाद जब ध्यान में बैठे तो काफी देर बाद मन में ख्याल आया कि गाड़ी ग्यारह दिन तक चली नहीं है और बैटरी भी पुरानी है तो स्टार्ट ना हुई तो ? बैटरी बैठ गई तो ? फिर मन बनाया की जो ऑफिस चला रहे हैं उनके पास पर्स, मोबाइल और चाबियाँ जमा हैं उनसे निवेदन कर के चाबी ले कर एक बार स्टार्ट कर लूँ ताकि बैटरी चार्ज हो जाए और वापसी में दिक्कत ना हो. या वो ही एक बार स्टार्ट कर दें. वैसे भी आश्रम शहर से दूर जंगल में था. जब ऑफिस पहुंचा तो मान्यवर ने बात करने से ही मना कर दिया वो भी इशारे में होंटों पर ऊँगली रख कर. खैर ग्यारहवें दिन गाड़ी चालू करने में कोई परेशानी नहीं हुई.
पर इस छोटी सी घटना पर विचार करें तो लगेगा की मन कैसे कैसे विचलित हुआ ? किस तरह से मन में संवेदनाएं जागी ? हम करने क्या आए थे और विचार कहाँ कहाँ और कैसे कैसे दौड़ते रहे ? मन के बारे में गौतम बुद्ध ने ( त्रिपिटक > सुत्त पिटक > खुद्दक निकाय के धम्मपद में ) कहा है:

फंदनं चपलं चित्तं दुरक्खं दुन्निवारयं I
उजुं करोति मेधावी उसुकारो'व तेजनं II

अर्थात चित्त क्षणिक है, चपल है, इसे रोके रखना कठिन है और निवारण करना भी दुष्कर है. ऐसे चित्त को मेधावी पुरुष उसी प्रकार सीधा करता है जैसे बाण बनाने वाला बाण को.
 
तो शिविर में हम मन को सीधा करने की कवायद कर रहे थे. मन को अनुशासन में लाना आसान नहीं है साहब. लगातार और कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी. कई बार ऐसा भी लगा कि अगर ध्यान लगाते हुए किसी मूर्ती या मन्त्र का सहारा होता तो शायद काम आसान हो जाता पर फिर वो विपासना से अलग रास्ता हो जाता.
नौंवे दिन कुछ हल्कापन रहा शरीर में भी और मन में भी. शायद इसलिए कि अंतिम याने दसवां दिन नज़दीक आ गया था और ग्यारहवें दिन छुट्टी मिलनी थी. मन में छुट्टी का विचार आया तो संवेदना जागी - सुखद संवेदना ! चिपकाव ! शरीर में कुछ हरकत हुई याने मुस्कराहट आ गई. इस संवेदना से जुड़ा विडियो चल पड़ा ! घर परिवार की याद आ गई अर्थात कितना मोह था ! ये सुखद संवेदना कब तक रहेगी ?

सुखदायी प्रकृति 



Wednesday, 4 October 2017

जिनेवा, स्विटज़रलैंड

स्विट्ज़रलैंड लगभग चौरासी लाख की आबादी वाला देश है जो ऐल्प्स के बर्फीले पहाड़ों में बसा हुआ है. देश का 60% भाग इन्हीं पहाड़ों में है. यह देश चारों ओर से दूसरे देशों - इटली, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और लिकटेंस्टीन से घिरा हुआ है. देश का कोई सागर तट नहीं है शायद इसीलिए यहाँ जल सेना नहीं है. स्विट्ज़रलैंड में तीन राजभाषाएँ - फ्रेंच, जर्मन, इटालियन चलती हैं और चौथी सह भाषा रोमान्श भी इस्तेमाल की जाती हैं.

स्थानीय करेंसी का नाम स्विस फ्रैंक है और आजकल एक स्विस फ्रैंक लगभग 67 रूपए का है. वर्ष 2016 के अनुमान के अनुसार प्रति स्विस व्यक्ति आय GDP( सामान्य ) के अनुसार 78245 अमरीकी डॉलर है और इसके मुकाबले भारत की 2016-17 अनुमानित प्रति व्यक्ति आय GDP( सामान्य ) पर आधारित फ़ॉर्मूले के अनुसार 1800 अमरीकी डॉलर है.

देश की राजधानी बर्न है और इसके अलावा जिनेवा एक महत्वपूर्ण शहर है. यह शहर जिनेवा झील के किनारे है और इसकी आबादी लगभग दो लाख है. जिनेवा या जनीवा( फ्रेंच में जेनेव और जेर्मन में जेन्फ़ ) में संयुक्त राष्ट्र संगठन UNO के बहुत से कार्यालय हैं जिसके कारण यहाँ बहुत सी गैर सरकारी संस्थाएं काम करती हैं. सारा साल तरह तरह के पोस्टर और तस्वीरें संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय के सामने लगी रहती हैं.
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :


संयुक्त राष्ट्र संघ कार्यालय और सामने साढ़े तीन टांग की कुर्सी - ये कुर्सी 39 फुट ऊँची है और साढ़े पांच टन लकड़ी से बनी है.  इस कुर्सी का आईडिया Paul Vermeulen का था जिसे स्विस आर्टिस्ट Daniel Berset ने डिजाईन किया और कारीगर Loius Geneve ने तैयार किया. इसका उद्देश्य ये जताना था कि लैंड माइंस या बारूदी सुरंगों और क्लस्टर बम का उपयोग बंद किया जाए. विरोध जताने के लिए अगस्त 1997 में तीन महीने के लिए लगाई गयी थी परन्तु तब से हटाई नहीं गयी 

संयुक्त राष्ट्र संघ के कार्यालय के आगे भारत सम्बन्धी पोस्टर - 1. AFSPA के विरोध में, 2. दलितों द्वारा मैला ढोने के विरोध में और 3. महिलाओं पर हिंसा के विरोध में 

बच्चों से कराई जाने वाली मजदूरी के विरोध में और पीने का पानी ना मिलने पर पोस्टर    

आज़ाद बलूचिस्तान का पोस्टर 

Reformation Wall के सामने सेल्फी 

आर्ट गैलेरी 

मोन्त्रेऔ में एक कलाकृति 

चर्च 
जिनेवा झील और पीछे किला - Chateau de Montreaux

झील का एक दृश्य 

शुभ प्रभात 


इससे पहले प्रकाशित 'लेमन झील, स्विटज़रलैंड' पर फोटो ब्लॉग इस लिंक पर है :

http://jogharshwardhan.blogspot.com/2017/09/blog-post_14.html


Contributed by Yash Wardhan from Geneva. जिनेवा से यश वर्धन  की प्रस्तुति 




Sunday, 1 October 2017

पैनकेक रॉक्स, न्यूज़ीलैण्ड

न्यूज़ीलैण्ड छोटे बड़े द्वीपों पर बसा देश है जिसकी जनसँख्या 48.19 लाख है. यहाँ दो मुख्य द्वीप हैं उत्तरी द्वीप और दक्षिणी द्वीप और इसके अतिरिक्त छोटे बड़े 600 द्वीप हैं जिनमें से पांच टापुओं के अलावा बसावट बहुत कम है.
* न्यूज़ीलैण्ड ऑस्ट्रेलिया से 1500 किमी पूर्व में है.
* देश की राजधानी वेलिंगटन है और यहाँ की करेंसी है न्यूज़ीलैण्ड डॉलर NZD. ये डॉलर आजकल लगभग 47 भारतीय रूपये के बराबर है.
* न्यूज़ीलैण्ड का प्रति व्यक्ति GDP( nominal) 36,254 डॉलर है और PPP के अनुसार 36,950 डॉलर है. इसके मुकाबले भारत का GDP ( nominal ) का 2016-17 का अनुमानित आंकड़ा थोड़ा कम है याने प्रति व्यक्ति 1800 डॉलर है. याने हिन्दुस्तानियों को कमर कस कर मेहनत करनी पड़ेगी.
* यहाँ के मूल निवासी माओरी कहलाते हैं. जनसँख्या में इनका अनुपात 14.9 % है और सरकारी काम काज के लिए इंग्लिश के अलावा माओरी भी यहाँ की सरकारी भाषा है.
* भारत की तरह न्यूज़ीलैण्ड में भी गाड़ियां बाएं ही चलती हैं. आप अपने देसी लाइसेंस और पासपोर्ट दिखा कर कार किराए पर लेकर खुद चला सकते हैं.
* दक्षिणी द्वीप का सबसे बड़ा शहर है क्राइस्ट चर्च जिसकी जनसँख्या चार लाख से कम है. क्राइस्ट चर्च से चार घंटे की ड्राइव पर एक जगह है पूनाकैकी - Punakaiki जिस पर प्रकाशित फोटो ब्लॉग का लिंक है : 


* पूनाकैकी से आगे समंदर किनारे एक जगह है पैनकेक रॉक्स - Pancake Rocks. कमाल की खूबसूरती है सीनरी में. प्रस्तुत हैं कुछ फोटो : 

खुबसूरत !

सागर तट और पैनकेक रॉक्स 
निर्मल प्राकृतिक  छटा 

बारिश की हलकी सी फुहार 

खोजी यात्री 

बर्फीली चोटियाँ, जंगल और झील 

सांझ ढली 

सुबह का कोहरा 

झील के उस पार 

फोटोग्राफर की फोटो 

स्थानीय तीतर बटेर नुमा चिड़िया 

पैनकेक रॉक्स 


Contributed by Mukul Wardhan from New Zealand - न्यू ज़ीलैण्ड से  मुकुल  वर्धन की प्रस्तुति   




Friday, 29 September 2017

पूनाकैकी, न्यूज़ीलैण्ड

न्यूज़ीलैण्ड छोटे बड़े द्वीपों पर बसा एक छोटा सा देश है जिसकी जनसँख्या 48.19 लाख है. दो मुख्य द्वीप हैं उत्तरी द्वीप और दक्षिणी द्वीप और इसके अतिरिक्त छोटे बड़े 600 द्वीप हैं जिनमें से पांच टापुओं के अलावा बसावट बहुत कम है.
* न्यूज़ीलैण्ड ऑस्ट्रेलिया से 1500 किमी पूर्व में है.
* देश की राजधानी वेलिंगटन है और यहाँ की करेंसी है न्यूज़ीलैण्ड डॉलर NZD. ये डॉलर आजकल लगभग 47 भारतीय रूपये के बराबर है.
* न्यूज़ीलैण्ड का प्रति व्यक्ति GDP( nominal) 36,254 डॉलर है और PPP के अनुसार 36,950 डॉलर है. इसके मुकाबले भारत का GDP ( nominal ) का 2016-17 का अनुमानित आंकड़ा थोड़ा कम है याने प्रति व्यक्ति 1800 डॉलर है. याने हिन्दुस्तानियों को कमर कस कर मेहनत करनी पड़ेगी.
* यहाँ के मूल निवासी माओरी कहलाते हैं. जनसँख्या में इनका अनुपात 14.9 % है और सरकारी काम काज के लिए इंग्लिश के अलावा माओरी भी यहाँ की सरकारी भाषा है.
* दक्षिणी द्वीप का सबसे बड़ा शहर है क्राइस्ट चर्च जिसकी जनसँख्या चार लाख से कम है.
* क्राइस्ट चर्च से चार घंटे की ड्राइव पर एक जगह है पूनाकैकी Punakaiki. भारत की तरह न्यूज़ीलैण्ड में भी गाड़ियां बाएं ही चलती हैं. आप अपने देसी लाइसेंस और पासपोर्ट दिखा कर कार किराए पर लेकर खुद चला सकते हैं. पूनाकैकी का रास्ता ठंडा और बहुत सुंदर है. रास्ता लगभग सुनसान ही है इत्मीनान से गाड़ी चला सकते हैं. पर आपको रास्ते में ढाबे और छोले भठूरे नहीं मिलेंगे !
प्रस्तुत हैं कुछ फोटो :

सुहाना सफ़र 

बर्फ से ढके पहाड़ 

मैदान झील और पहाड़ 

ऊँची नीची राहें 

सुंदर झील 

एक और सुहाना दृश्य 

झील किनारे लगा बोर्ड बता रहा है कि किसी समय माओरी लोग यहाँ सालाना शिकार पर आते थे 

चिड़ी चोंच भर ले गई - स्थानीय बत्तख़


Contributed by Mukul Wardhan from New Zealand - न्यू ज़ीलैण्ड से  मुकुल  वर्धन की प्रस्तुति   



Friday, 22 September 2017

हिंदी दिवस की पार्टी

साब ने अपने मटके जैसे पेट पर लाल टाई सेट की और शीशे में नज़र मारी. टाई ओके है. सिर पर आठ दस बाल बचे थे पर फिर भी आदतन उन बालों में कंघी घुमा दी. बेल्ट दुबारा से बाँधी. ये कमबख्त परेशान करती थी. दिन में दो तीन बार खोलकर फिर बांधनी पड़ती थी. क्या किया जाए बियर की चियर्स तो शाम को करनी ही होती है. और अब फर्क भी क्या पड़ता है जी रिटायर होने में चार महीने ही बाकी हैं. अब मेकअप की आखरी आइटम थी फुसफुस. दोनों साइड खुशबू स्प्रे करके सरकारी गाड़ी में बिराजमान हो गए. ड्राईवर से बोले,

- ऑफिस चलो. और सुनो 11 बजे मंत्री जी की फ्लाइट आनी है. हिंदी अफसर को ले जाना और रास्ते में दो ढाई सौ का एक बुक्के बनवा लेना. उनके नाम की तख्ती भी बनवा कर साथ ही ले जाना. निर्मला को बोल देना कंप्यूटर से हिंदी में कागज़ पर सुंदर सा नाम छाप देगी. तुम तख्ती पकड़ना और निर्मला बुक्के पकड़ लेगी. बुक्के का बिल संभाल लेना.

हमारे साब बड़े सिस्टम से चलते हैं तभी ना झुमरी तलैय्या के रीजनल मैनेजर हैं. झुमरी तलैय्या बैंक का सबसे बड़ा रीजन है और यहाँ बड़े बड़े लोन हैं. साब की बैंक के चेयरमैन साब के साथ अच्छी पटती है. साब बड़े बड़े लोगों के साथ शाम को क्लब में बैठते हैं. कभी कभी मेमसाब भी साथ जाती हैं.
ऑफिस पहुँच कर साब ने एक नज़र हॉल में मारी फिर अपने केबिन में घुस कर सिंहासन पर बैठ गए. चाय की चुस्की लेकर घंटी मार दी.
- निर्मला को भेजो.
- निर्मला जी गुड मोर्निंग. वाह ये अच्छा किया आज आप साड़ी पहन कर आई हैं. आज हिंदी अधिकारी लग रही हैं. वर्ना जीन वीन पहन कर आती हैं तो अंग्रेज़ी भाषा की अफसर लगती हैं. ऐसा है कि मंत्री जी की 11 बजे की फ्लाइट है. ड्राईवर आपको ले जाएगा. मंत्री जी को आप बुक्के दे देना और ढंग से ले आना. अच्छी रिपोर्ट लेनी है उनसे. डीएम ऑफिस जाना है वरना मैं खुद ही जाता. खैर उनको शाम को मैं छोड़ दूंगा. और क्या तैय्यारी है आज की ?
- जी बारा साढ़े बारा बजे मुख्य अतिथि को कार्यालय का निरीक्षण करा देंगे और मैनेजरों से मिलवा देंगे. कोई फाइल वगैरा देखना चाहें की हिंदी में काम हो रहा है या नहीं वो दिखा देंगे. एक बजे से दो बजे तक कांफ्रेंस रूम में मीटिंग होगी जिसमें आप मुख्य अतिथि का परिचय और सम्मान कर देंगे. दस मिनट के लिए उनके आशीर्वचन सुन लेंगे. प्रतियोगिता के पुरस्कार उनसे दिलवा देंगे. फिर आप की बारी है. अंत में मैं धन्यवाद प्रस्ताव रख दूंगी. उसके बाद लंच.
- ठीक-ए ठीक-ए. हमारे ऑफिस की कमजोर कड़ी कौन कौन हैं ?
- वेंकटेश जी उन्हें तो हिंदी लिखनी नहीं आती थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं और बोल लेते हैं. दूसरे हैं कपिल मोहन जी जो अच्छी हिंदी जानते हुए भी फाइलों में इंग्लिश में ही टिपण्णी करते हैं. मानते नहीं हैं. बाकी स्टाफ ठीक है.
- अच्छा. एक काम करो इन दोनों को कोई स्पेशल प्राइज दिलवा दो मंत्री जी से. कुछ भी बहाना मार देना कि हिंदी के लिए बड़ी मेहनत कर रहे हैं ये दोनों प्रबंधक. गिफ्ट में कोई पेन सेट वेट दिलवा देना. और हाँ मेरी तो आख़री स्पीच है अगले हिंदी दिवस में तो मेरी पेंशन लग चुकी होगी. एक पर्चे पर ज़रा स्पीकिंग पॉइंट्स लिख देना बाकी मैं संभाल लूंगा.
- जी सर.

मंत्री जी द्वारा ऑफिस के निरीक्षण के बाद कांफ्रेंस चालू हुई. इनाम बांटे गए और मंत्री जी द्वारा हिन्दी में काम करने पर शाबाशी दी गई और राष्ट्र भाषा के प्रचार प्रसार पर जोर दिया गया. हिंदी अधिकारी ने अनुरोध किया कि क्षेत्रीय प्रबंधक दो शब्द कहें तो उस पर आर. एम. साब जो बोले उसके कुछ अंश:

- माननीय मंत्री जी हमारा तो दिन अंग्रेजी के अखबार से शुरू होता है और शाम टीवी की अंग्रेजी न्यूज़ पर जाकर ख़तम होती है. ऐसा नहीं है कि हिंदी पढ़ लिख नहीं सकते पर अगर आसान सी हिंदी होती तो शायद जल्दी बदलाव आ जाता. पहले बैंक में इंग्लिश के सर्कुलर निकलते थे फिर महीने बाद उनका हिंदी वर्शन आता था. अब दोनों एक साथ आने लगे हैं. लेकिन हिंदी सर्कुलर के अंत में एक लाइन लिखी होती है की विवाद की स्थिति में इंग्लिश सर्कुलर ही मान्य होगा ! चलिए हिंदी लागू हो गई. एक और बात है मंत्री जी जापान में जापानी भाषा अधिकारी नहीं है, रूस में रूसी भाषा अधिकारी नहीं पर हिन्दुस्तान में हिंदी भाषा अधिकारी है. एकाधा हिंदी अफसर नहीं है हजारों की संख्या में हैं चाहे उनके बच्चे इंग्लिश माध्यम स्कूलों में पढ़ते हों. खैर धीरे धीरे लागू हो जाएगी. हमारी ये पारी तो समाप्त हो रही है अगले हिंदी दिवस में मुलाकात नहीं हो पाएगी. सभी को शुभकामनाएं और धन्यवाद.

सभा समाप्त हुई और चूँकि एयरपोर्ट जाने में काफी समय था तो क्षेत्रीय प्रबंधक ने माननीय मंत्री जी से झुमरी तलैय्या क्लब में चलकर बैठने का अनुरोध किया जो स्वीकार कर लिया गया. गपशप हुई और अंग्रेजी के दो दो पेग लगाए गए. माननीय मंत्री जी हवाई जहाज में बैठ कर घर चले गए और क्षे.प्र. सरकारी गाड़ी में बैठ कर घर चले गए.

घर की ओर 
 


Sunday, 17 September 2017

विपासना शिविर का छठा और सातवाँ दिन

विपासना मैडिटेशन के पांच दिन हो चुके थे और अब सुबह चार बजे उठने में कोई दिक्कत नहीं थी. अधिष्ठान में लगातार बिना हिले जुले बैठने में भी अभ्यस्त हो गए थे. वैसे भी तो ये बात कहते तो किससे कहते ? बोलती तो बंद थी पांच दिनों से ! देख लीजिये दुखड़े तो दुखड़े अपने छोटे मोटे सुखड़े भी किसी को बता नहीं पाए. इसलिए कुछ हद तक अपने अंदर के उबाल से छुटकारा हो गया. ये भी एक अनुभव था जिसका महत्व उस वक़्त समझ में नहीं आया पर अब विचार करने पर लगता है की अपनी कथा व्यथा सुनाने को मन कितना आतुर हो जाता है और मानसिक बैचेनी का कारण बनता है. जैसे कि 'मैं और मेरे साथ जो हुआ वो तो दुनिया से अलग है ! स्पेशल है !' जबकि ऐसा बहुत से लोगों के साथ होता ही रहता है.

पांच दिन गुजरने के बाद दूसरे साधकों पर ध्यान जाना भी घट गया था. कोई ऐसे कर रहा है या वैसे उस पर नज़र जानी स्वत: ही बंद हो गई. दूसरों को क्या देखें पहले खुद से तो निपट लें ! आचार्य जी ने दिन में एक एक घंटे की छूट भी दी कि या तो आप अपने कमरे में अभ्यास कर लें या फिर पगोडा में. अपने कमरे में किया तो बीच बीच में विघ्न पड़ा किसी बाहरी कारण से नहीं बल्कि अपने ही मन की हलचल से.

जहां तक पगोडा की बात है यह मंदिर नुमा बड़ा गोल हॉल था. इसमें किनारे किनारे गोलाई में शायद 30-40 छोटे छोटे कमरे या कक्ष या कोठरियां थीं. कोठरी इस लिए की इसमें आप या तो खड़े हो सकते थे या बैठ सकते थे परन्तु लेट नहीं सकते थे. सामने की दीवार में लगभग छे फुट की ऊँचाई पर एक गोलाकार रोशनदान था. अगर कक्ष के बीचो बीच फर्श पर आप बैठ जाएं तो दो फुट आगे, दो फुट बाएं और और दो फुट दाएं सफ़ेद दीवार और पीठ के दो फुट पीछे दरवाज़ा बंद. अटपटा सा लगा, घुटन सी महसूस हुई और लगा जेल में आ गए ! ठीक से ध्यान नहीं लगा. इस ध्यान कक्ष की पहली बैठक का अनुभव अलग ही रहा. बोलती बंद, आँख बंद, शरीर की हलचल बंद, तीन तरफ से दीवारें बंद और पीठ पीछे दरवाज़ा बंद याने * ? "x" @ # % $* ! उस वक़्त की भावनाओं के लिए शब्द कम पड़ गए ! पर अगले दिन जब उसी कक्ष में साधना की तो मन की स्थिति सामान्य रही.

छठे दिन और सातवें दिन एक बार फिर से पद्मासन लगा कर, कमर गर्दन सीधी रख कर और आँखें बंद करके शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान लगाना शुरू कर दिया. शुरू में तो स्थूल वेदनाएं ही समझ में आ रही थीं जिसमें से सबसे बड़ी तो थी घुटने का दर्द जो लगातार बैठने से हो रहा था. कन्धों में और रीढ़ का हड्डी में कुछ महसूस ही नहीं होता था. पर अभ्यास के बाद बारीक और सूक्ष्म संवेदनाएं भी पकड़ में आने लगीं. किसी किसी अंग में दबाव या खिंचाव पर भी ध्यान जाने लगा. छाती और फेफड़ों की हलकी सी हरकत भी पहचान में आने लगी. वो दोहा याद आ गया :

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात के सिल पर परत निसान !

पगडंडियाँ 




Thursday, 14 September 2017

लेमन झील, स्वित्ज़रलैंड

स्विट्ज़रलैंड लगभग चौरासी लाख की आबादी वाला देश है जो ऐल्प्स के बर्फीले पहाड़ों में बसा हुआ है. यह देश चारों ओर से दूसरे देशों - इटली, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और लिकटेंस्टीन से घिरा हुआ है. शायद इसीलिए यहाँ वायु सेना और थल सेना तो है परन्तु जल सेना नहीं है. स्विट्ज़रलैंड में चार राजभाषाएँ - फ्रेंच, जर्मन, इटालियन और रोमान्श इस्तेमाल की जाती हैं.

स्थानीय करेंसी का नाम स्विस फ्रैंक है. वर्ष 2016 के अनुमान के अनुसार प्रति व्यक्ति आय सामान्य GDP के अनुसार 78245 अमरीकी डॉलर है और इसके मुकाबले भारत की 2016-17 अनुमानित प्रति व्यक्ति आय सामान्य GDP पर आधारित फ़ॉर्मूले के अनुसार 1800 अमरीकी डॉलर है. याने हिन्दुस्तानियों को अभी बहुत मेहनत करनी है !

इस ठन्डे और खुबसूरत देश की कुछ फोटो यश वर्धन के सौजन्य से प्रस्तुत हैं:

लेमन झील ( अंग्रेजी में Lake Geneva और फ्रेंच में  le lac leman ) के किनारे सुंदर मूर्ति समूह 

लेमन झील के किनारे गायक फ्रेड्डी मरकरी की मूर्ति 

लौसने Lausanne की झील 

लौसने शहर में एक मूर्ति - समुद्री घोड़े की सवारी 

झील में एक मज़ेदार कृति 

झील का एक दृश्य

झूला 

लौसने शहर में 

Contributed by Yash Wardhan.